पिताजी के जूते

pitaji ke jute

दोस्तों आप लोगों ने राजा-रानी व परियों की पुरानी कहानियाँ तो बहुत पढ़ी और सुनी होंगी। आज मैं आपको एक Real Story से अवगत कराने जा रहा हूँ। हो सकता है ऐसी घटना आप में से बहुतों के साथ घटी भी होगी ! यह एक ऐसी कहानी है जिसे पढ़कर शायद आपकी आँखों में आँसू जरूर आ जायेंगे। यह कहानी मेरे किसी मित्र ने Facebook पर Share किया था। मैंने इसे पढ़ा और यह मेरे दिल को छू गई, इसलिए आप लोगों के साथ इसे Share करना चाहता हूँ, उम्मीद है आप लोगों को भी बहुत अच्छी लगेगी।

कहानी कुछ इस प्रकार है – रविवार का दिन था और मैं बड़े गुस्से में घर छोड़ कर निकल बाहर चला आया। मन में सोचा अब तभी लौटूंगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा। इतना गुस्से में था कि गलती से पापा के ही जूते (Shoes) पहन कर के निकल गया। मन ही मन में बड़बड़ा रहा था कि जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते, तो क्यूँ इंजीनियर बनाने के सपने देखतें हैं। आज तो मैं हिम्मत करके, पापा का पर्स भी उठा लाया था। पर्स जिसे वो किसी को हाथ तक न लगाने देते, यहाँ तक कि मम्मी को भी नहीं। इस पर्स में जरुर, पैसों के हिसाब की डायरी होगी। पता तो चले कितना माल छुपाया है पिताजी ने हम सबसे।

कच्चे रास्ते से आगे चलकर जैसे ही मैं पक्की सड़क पर आया, मुझे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है। मैंने जूता निकाल कर देखा कि मेरी एडी से थोडा सा खून रिस रहा था। कोई कील मेरे पैर में घुस गयी थी। दर्द से गुस्सा और बढ़ गया।

आगे कुछ दूर ही बढ़ा था कि मुझे पैरों में गीलेपन का एहसास हुआ, सड़क पर पानी बिखरा पड़ा था। पाँव उठाकर देखा तो जूतों के निचले हिस्सों (Sole) में छेद थे। मैं जैसे – तैसे लंगडाकर बस स्टॉप पहुंचा, पता चला एक घंटे तक कोई बस नहीं थी। मैंने सोचा क्यों न पर्स की तलाशी ली जाये।

मैंने जैसे ही पर्स खोला तो उसमें एक पर्ची दिखाई दी। उस पर लिखा था कि लैपटॉप के लिए 40 हजार दफ़्तर के किसी साथी से उधार लिए। यह देखते ही मुझे बिजली का करैन्ट सा लगा क्योंकि लैपटॉप तो मेरी जिद पर ही मेरे लिए ख़रीदा गया था।

अब दूसरा एक मुड़ा हुआ पन्ना देखा, उसमे मेरे को पिछले महीने मेरे लिए ख़रीदे गए Branded Shoes का बिल था। माँ पिछले चार महीने से हर पहली को पिताजी को कहती थी “अजी सुनो आप नए जुते ले लो”….
और वे हर बार कहते “अभी तो 6 महीने जूते और चलेंगे…”

तीसरी पर्ची थी 15 दिन पुरानी पेपर की कटिंग। जिसमें लिखा था “पुराना स्कूटर दीजिये और एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल क़िस्तों में ले जाइये।” यह पढ़ते ही मेरा दिमाग घूम गया, पापा का 15 साल पुराना स्कूटर जिसपर वो रोज हमारे लिए फल, सब्जियाँ और राशन लादकर लाते हैं। ओह्ह्ह !!!

मैं तुरन्त घर की तरफ भागा। पांवो में वो कील अब भी चुभ रही थी। मैं घर पहुँचा, न पापा थे न स्कूटर। ओह्ह्ह नही, मैं समझ गया कहाँ गए।

मैं दौड़ा और इस्तहार पर लिखे पते पर पहुँचा। पापा वहीँ थे। मैंने सब के सामने उनको गले से लगा लिया, और आँसुओं से उनका कन्धा भिगो दिया। नहीं…पापा नहीं.. मुझे नहीं चाहिए मोटर साइकिल। बस आप नए जुते ले लो और मुझे अब बड़ा आदमी बनना है। वो भी आपके आदर्शो से।।।

दोस्तों जब हम अपनी युवावस्था में होते हैं तो हमें किसी चीज की कोई चिंता नहीं होती। हमारी सारी जरूरतें माँ-बाप खुद कष्ट सहकर कहीं न कहीं से पूरी करते हैं। उस समय हमें सिर्फ अपनी जरूरतें दिखाई देतीं हैं। हममें से बहुतों को तो यह भी पता नहीं होता है कि हमारे माँ-बाप हमारी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे कहाँ से लाते हैं तथा पैसे कमाने के लिए उन्हें कितना कष्ट सहना पड़ता है।

माँ-बाप कभी भी अपने बच्चों को कष्ट में नहीं देख सकते हैं। और हर माता-पिता का सपना होता है कि उनकी औलाद पढ़-लिखकर नेक इंसान बने और बड़ा होकर उनका नाम रोशन करे। दोस्तों हमारा भी फर्ज बनता है कि हमें कभी भी किसी चीज के लिए घर वालों से जिद नहीं करनी चाहिए। अपने घर के हालात के अनुसार ही खर्च करना चाहिये। और हो सके तो अपने घर के कार्यों में भी हाथ बताना चाहिए। माता-पिता से बढ़कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं है, उनकी भावनाओं को समझो और उनका सम्मान करो।

यदि यह कहानी आप के दिल को छू जाए तो Comment करना मत भूलना। धन्यवाद !

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Comments

  1. By Amit Kumar Tripathi

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