अपने पास बुला ले माँ

माँ अब तेरे हाथ नहीं जलेंगे

शाम को घर वापस आकर, जब कपड़े फेंके बिस्तर पर। सोचा था माँ आकर, रख देगी इसको तहकर कर।। कुछ पल के बाद उस कपड़े ने, मुझको आवाज लगाई। बोला कुछ पैसों की खातिर, कहाँ आ गए भाई।। पानी भी खुद लाकर पीयो, रखो मुझे जगह पर। सब कुछ रखो ठीक अपना, माँ यहाँ नहीं … Read more

सन्नाटा

गुजरती हैं आवाजें गलियों के सन्नाटो में जब एक दर्द व्याकुलता सा आलम होता चौक जाते हैं, दस्तक देती आवाजों से गलिओं में अक्सर सन्नाटा पाता व्याकुलता भर जाती आँखों में रातों को कौन पुकार रहा कराह, तड़प, रुदन भरी है भटक रही किसे पहचान रहा कम्पन करते तन को अपने काबू में कर पाता … Read more