प्रयागराज अर्धकुम्भ मेला क्या है , क्यों लगता है?

kumbh mela allahabad

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि भारत त्योहारों का देश है, यहाँ पर हर त्यौहार बडी ही श्रद्धा – भक्ति से और बड़े पैमाने में मनाया जाता है। ऐसा ही एक उत्सव होता है कुम्भ का मेला। ये मेला इतना भव्य होता ही कि इस मेले को देखने के लिए लोग देश – विदेश से यहाँ आते हैं। इस साल कुम्भ का मेला प्रयागराज (इलाहबाद) में हो रहा है। ये मेला 2019, यानी इस साल 14 जनवरी से 04 मार्च तक चलेगा।

प्रयागराज अर्धकुम्भ मेला क्या है?

कुम्भ का मेला हर 12 वर्ष में होता है। इन सालों के बीच में 6-6 साल के अंतराल में अर्धकुंभ का मेला लगता है। इस मेले का बहुत महत्व है। इस मेले के दौरान हजारों लोग गंगा नदी, यमुना नदी और सरस्वती नदी के संगम स्थल पर स्नान करने आते हैं। ऐसा माना जाता है कि कुम्भ मेले के दौरान इन पावन नदियों के संगम स्थल पर नहाने से इंसान सभी पापों और कष्टों से मुक्ति पा लेता है। ऐसा सुनने में आया है कि इस अर्धकुम्भ को कुम्भ मेला ही कहा जायेगा और इस फैसले के पीछे है ये मन्त्र – ‘ॐ पूर्णमद: पूर्णमिद।’ ये मन्त्र यजुर्वेद ग्रन्थ से लिया गया है।

ये मेला बेहद भव्य और विशाल होगा क्योंकि इस साल की तैयारियों में कुछ नई चीजें जुडी हैं, वो भी खासकर युवाओं के लिए। उनके लिए कुछ ख़ास सेल्फी पॉइंट्स बनाये गये हैं और उनके लिए वाटर एम्बुलेंस की व्यवस्था भी की गई है। इतना ही नही यहाँ पर 55 दिनों तक रामलीला का आयोजन किया जाएगा और यहाँ पर एक संस्कृत ग्राम भी बनाया गया है जहाँ पर लोगो को कुम्भ मेले के महत्व और उससे जुड़े सम्पूर्ण इतिहास की जानकारी दी जायेगी।

प्रयागराज अर्धकुम्भ मेला कब लगता है?

ज्योतिषों के अनुसार तो कुम्भ का मेला मकर संक्रांति के दिन शुरू होता है क्योकि इस दिन कुम्भ स्नान योग बनता है यानि इस दिन सूर्य और चन्द्रमा मेष, ब्रहस्पति और वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं। इस महायोग की मान्यता इसलिए भी है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दौरान स्वर्ग के दरवाजे खुल जाते हैं।

प्रयागराज अर्धकुम्भ क्यों लगता है?

कुम्भ का अर्थ होता है घड़ा यानि मटका, कलश। कुम्भ का मेला क्यों लगता है इसके पीछे एक कहानी है। इस कहानी के अनुसार इंद्र देव और अन्य देवताओं को महर्षि दुर्वासा ने श्राप दिया था जिसकी वजह से वो काफी कमजोर हो गये थे। इस चीज का फायदा दैत्यों ने उठाया और देवताओं पर आक्रमण कर दिया, इस युद्ध में जब देवतागण हारने लगे थे तब सभी देवता विष्णु जी के पास गये। विष्णु जी ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए कहा। समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और शेषनाग को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया। एक तरफ देवता और दूसरी तरफ असुर, दोनों द्वारा मिलकर मंथन करने पर समुद्र से अमृत कलश निकला। इंद्र देव के पुत्र जयंत इस अमृत कलश को लेके आकाश में उड़े और भागने लगे। तभी असुरो के गुरु “गुरु शुक्राचार्य” ने उन्हें आदेश दिया कि वो जयंत का पीछा करें। इस सबके के दौरान उस अमृत कलश से कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिरी। ये बूंदे गिरी हरिद्वार, प्रयाग और नासिक में। इसी कारण इन जगहों पर कुम्भ का मेला आयोजित किया जाता है।

आपको ये जानकर आश्चर्य होगा ये अमृत कलश को प्राप्त करने के लिए असुरो और देवताओं के बीच 12 दिन तक युद्ध चल रहा था पर ये 12 दिन इंसानों के 12 साल के सामान थे इसलिए कुम्भ का मेला 12 बार मनाया जाता है। इन 12 कुम्भ में से 4 कुम्भ मेले पृथ्वी पर और 8 कुम्भ मेले देवलोक में मनाए जाते हैं।

उम्मीद है आप भी इस अद्वितीय प्रयागराज अर्धकुम्भ मेले का हिस्सा बनेंगे।