होलिका दहन का समय निबंध

Holika dahan kab hai : होलिका दहन और होली बंसत ऋतू का मुख्यं त्योंहार है, बंसत ऋतू में जब हर तरफ हरियाली और फूलों के नजारे देखने को मिलते है उसी समय होली का त्योंहार इस माह को और भी अच्छा बना देता है. होली हमारे भारत और नेपाल दोनों देशों के मुख्य त्योहारों में से एक है. होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होती है और यह दो दिन तक मनाई जाती है. होली की पूर्व संध्या को होलिका दहन भी कहा जाता है. इसे कुछ भाषाओं में छोटी होली भी कहा जाता है. होलिका दहन अपने आप में बहुत ज्यादा महत्व रखता है और भारत में होलिका दहन यानि होली की पूर्व संध्या को यह त्योंहार मनाया जाता है.

होलिका दहन का महत्व

बुराई में पर अच्छाई की जीत का प्रतीक त्योंहार होली के रूप में भारत में हर साल मनाया जाता है. होली का यह त्योंहार दो दिनों तक चलता है और होली का पहला दिन होलिका दहन कहलाता है. माना जाता है की अगर इस दिन कोई होलिका दहन की पूजा करें और गांव, शहर, मोहल्ले और कस्बे में होलिका दहन करें यानि होलिका जलाए तो वहां अन्न और धन की कमी कभी नही आती है. यह त्योंहार भगवान की भक्ति को भी दर्शाता है, इस त्योंहार के अनुसार अगर कोई भगवान को सच्ची श्रधा से मनाये तो भगवान अपने भक्त की मदद जरुर करता है.

2021 में होलिका दहन का समय

2021 में 28 मार्च रविवार के दिन यह त्योंहार यानि होलिका दहन मनाया जाएगा. होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 7:30 बजे से 8:30 बजे तक रहेगा.

भारत में होलिका दहन कैसे मनाया जाता है?

हमारे भारत में होलिका दहन बहुत ही रोचक तरीके से मनाया जाता है. खासकर गाँव के लोग इस त्योंहार को काफी अच्छे से मनाते हैं. सबसे पहले वह अपने गाँव के नजदीक कोई खाली जगह देखते है और देखते हैं की पास में कोई पानी वाली जगह है या नहीं, क्योंकि होलिका दहन में पानी का भी काफी महत्व है. इस दिन गाँव के लोग इकठ्ठा होकर अपने घर से लकड़ी, गोबर के उपले, खरपतवार इत्यादि एक जगह पर इकट्ठा करते हैं. सभी लकड़ियों एंव उपलों को एक जगह पर रखकर उसके अंदर एक बड़ी लकड़ी जो आसानी से ना जले वो रखते है. संध्या के समय सही मुहूर्त पर इन उपलों में घी, नारियल एंव अनेक सामग्री डालकर आग लगा दी जाती है.

सभी लोग प्रार्थना करते है और एक व्यक्ति पहले से ही तैयार होता है और वह उस अग्नि में पड़ी उस बड़ी लकड़ी को उठाकर भाग जाता है जलती आग से वो यूँ निकल जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं, और दौड़ते हुए पानी वाले स्थान में जाकर उस लकड़ी को गिरा देता है और वह पानी में छलांग लगा देता है. वहां पर मौजूद लोग उसके नाम का उद्घोष करते है और होलिका की आग को अपने घर ले जाते हैं. भारत में कुछ जगहों पर होलिका की आग को अगले होलिका दहन तक संभालकर रखा जाता है. इसी अग्नि से अगले दिन होली के पकवान बनाये जाते है. कुछ जगहों पर इस दिन जौ को भुनकर खाया जाता है, कहते हैं की जौ के स्वाद और अग्नि की लपटों से पता चल जाता है की अगले साल फसल कैसी होगी.

होलिका दहन क्यों मनाया जाता है?

होलिका दहन का त्योंहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, कहते है की इस त्योंहार को मानाने का उद्देश्य एक मात्र यह बताना है की ईश्वर किसी ना किसी रूप में किसी भी वक्त किसी भी जगह अपने भक्तों की मदद के लिए तैयार रहते हैं. होलिका दहन यानि फाल्गुन माह की पूर्णिमा को ही होलिका, हिरनकश्यप और श्री कृष्ण द्वारा पूतना का अंत किया गया था. होलिका से जुड़ी अनेक कहानियां हैं, इनमे से एक प्रचलित कहानी का जिक्र इस निबंध में हम कर रहे हैं.

होलिका दहन की कहानी

भारतीय इतिहास में होलिका दहन से जुड़ी अनेक पौराणिक कहानियां मौजूद है, लेकिन इनमे सबसे ज्यादा प्रचलित कहानी है प्रहलाद और हिरनकश्यप की, इस कहानी में पता चलता है की कैसे भगवान अपने भक्तों की मदद करते हैं. आइये पढ़ते है यह कहानी “प्राचीन काल में हिरनकश्यप नामक एक राजा हुआ करता था, वह इतना क्रूर था की उसने स्वंय को ईश्वर की तरह पूजने के लिए अपनी प्रजा को मजबूर किया. अगर कोई उसकी बात नहीं मानता या उसकी पूजा नहीं करता तो वह उसकी हत्या करवा देता था या उसे दंड देता था. कुछ समय बाद उसके घर में प्रहलाद नाम का एक लड़का जन्म लेता है, हिरनकश्यप को उसकी प्रजा भगवान के रूप में पुजती थी लेकिन हिरनकश्यप का बेटा प्रहलाद ईश्वर की अराधना करता और हिरनकश्यप की पूजा से इंकार करता है. हिरनकश्यप प्रहलाद को मारने का आदेश देता है लेकिन सभी सैनिक और उसकी सभी चाले प्रहलाद को मारने में असमर्थ होती है. क्योंकि भगवान किसी न किसी रूप में प्रहलाद की मदद करने के लिए आ जाते थे.

हिरनकश्यप की बहन थी होलिका, होलिका को वरदान था की वह कभी आग में नहीं जल सकती है. अगर वह किसी तरह के अच्छे कार्य के लिए अगर आग में भी जाकर बैठ जायेगी तो वह आग में नहीं जलेगी. ऐसे में हिरनकश्यप ने होलिका को प्रहलाद को मारने के लिए कहा जो की एक बुरा कृत्य था और भगवान के भक्त के विरुद्ध था ऐसे में जब होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है तो होलिका उस अग्नि में जल जाती है और प्रहलाद को कुछ नहीं होता है. उसी समय के बाद हिरनकश्यप ने भी ईश्वर की सच्चाई को समझा और उसका घमंड चूर-चूर हो गया.  भगवान विष्णु ने हिरनकश्यप को उसके पापों का फल दिया और उसे मौत के घाट उतार दिया. उसी दिन से होलिका दहन मनाया जाता है, कहते हैं की इसी दिन होलिका और हिरनकश्यप का अंत हुआ था, ऐसे में बुराई पर अच्छाई की जीत को होलिका दहन के रूप में आज भी मनाया जाता है.

निष्कर्ष

होलिका दहन का तरीका आधुनिक समाज में बदल गया है, आज पहले की तरह होलिका दहन नहीं किया जाता है लेकिन आज भी भारत, नेपाल और अन्य देश जहाँ हिन्दू धर्म के लोग रहते है वहां पर होलिका दहन मनाया जाता है. होलिका दहन के बाद होली का त्योंहार एक दुसरे के गले मिलकर और गुलाल लगाकर मनाया जाता है.