होलिका दहन क्यों किया जाता है?

“हमारी ज़िन्दगी यूँ तो है, इक काँटों भरा जंगल।
अगर लगने लगे मधुबन, समझ लेना कि होली है।।”

कवी नीरज गोस्वामी की इन पंक्तियों से आप समझ सकते हैं कि होली का त्यौहार एक आम आदमी के जीवन में क्या महत्व रखता है। होली का त्यौहार एक ऐसा त्यौहार है जब इंसान तो क्या, प्रकृति भी नए पत्तों व फूलों से खुद का श्रृंगार करने में जुट जाती है। राधा कृष्ण के प्रेम-प्रसंगों के गीत जब फिजाओं में सुनाई देने लगे तब समझ लेना चाहिए कि होली है।

होलिका दहन से जुड़ी कथा

प्रह्लाद, होलिका और हिरण्यकश्यप के साथ जुड़ी हुई है  होली दहन की कथा। एक किंवदंती के अनुसार, हिरण्यकश्यप नामक दुष्ट राजा का पुत्र था प्रह्लाद, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप ने अपने राज्य में घोषणा करवा दी थी कि वह ही ईश्वर है और उसकी प्रजा को उसके अलावा किसी देवी-देवता की पूजा की अनुमति नहीं थी। हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद की भक्ति पसंद नहीं थी। वह चाहता था कि प्रहलाद भगवान विष्णु की पूजा बंद कर औरों की तरह उसे ही ईश्वर माने।

Holika Dahan

जब प्रह्लाद ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तो हिरण्यकश्यप ने उसे मारने का षड्यंत्र रचा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को एक दिव्य वरदान प्राप्त था जिससे अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को होलिका की गोद में बैठा दिया और दोनों को आग लगा दी। भगवान विष्णु के आशीर्वाद से, प्रह्लाद, जो भगवान् विष्णु का  नाम जपते रहे, अछूते रहे, जबकि होलिका आग में जलकर खाक हो गयी।

कुछ किंवदंती कहती हैं होलिका की आग से रक्षा एक शाल करता था। जब होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठी, तब भगवान विष्णु के आशीर्वाद से, एक तेज हवा चली और प्रह्लाद को उस शॉल से ढक दिया, जिससे वह बच गया, जबकि होलिका जल गई। इस कथा के साथ, होलिका दहन की परंपरा, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन गई।

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार होलिका दहन की रस्म फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को सूर्यास्त के बाद शुरू होने वाली प्रदोष काल के दौरान निभायी जाती है। इस वर्ष होलिका दहन की तिथि 20 मार्च 2019 है, जबकि होलिका दहन 2019 का समय रात के 8:57 से लेकर 12:28  बजे तक है।

होलिका दहन से जुड़ी परम्पराएं और रिवाज

होलिका दहन की तैयारी एक दिन पहले से शुरू हो जाती है। लोग लकड़ियों को इकट्ठा करते हैं और होलिका का पुतला बनाकर लकड़ियों पर रखा जाता है। भक्त प्रहलाद की जय- जयकार के साथ होलिका को आग लगाई जाती है। लोग अग्नि की प्रदक्षिणा करते हैं और भगवान् विष्णु को याद कर उनसे प्रार्थना करते हैं।

होलिका दहन के दौरान भक्त अग्नि में “जौ” भूनते हैं और इसे अपने घर ले आते हैं क्योंकि ऐसा करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा होलिका दहन की अग्नि में उपले जलाने की भी परम्परा है। यह इंसान की सभी समस्याओं को जलाने की मान्यता को दर्शाता है।

क्या हैं शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन से जुड़े नियम

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिस दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं।

होलिका-दहन के दो नियम ध्यान में रखे जाने चाहिए –

• पहला, होलिका-दहन वाले दिन ‘भद्रा’ नहीं होनी चाहिए. भद्रा के दौरान होलिका दहन निषेध माना जाता है।

• दूसरा, प्रदोषकाल के दौरान ही पूर्णिमा होनी चाहिए यानी कि उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।

श्री कृष्ण से जुड़ी होली की कथा

होली को फगवा और होलिका को पूतना भी कहा जाता है। एक अन्य धार्मिक कथा के अनुसार मथुरा का दुष्ट राजा कंस  अपने भतीजे कृष्ण से अपनी जान को खतरा महसूस करता था। कंस ने स्तनपान कराने की आड़ में शिशु कृष्ण को जहर देने के लिए पूतना नामक राक्षसी को भेजा। पूतना सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर कृष्ण के पास पहुँचती है। कृष्ण न केवल पूतना का जहरीला दूध चूस लेते हैं, बल्कि पूतना का खून भी, जिससे वह वापस दानव में बदल जाती है। वह वहां से दौड़ती है लेकिन आग की लपटों में फँस भस्म हो जाती है, जबकि शिशु कृष्ण की त्वचा का रंग गहरे नीले रंग में परिवर्तित हो जाता है।

इसी घटना की याद में फगवा पूतना को जलाकर मनाया जाता है। मिथक के अनुसार, अपनी युवावस्था में, कृष्ण अक्सर इस बात से दुखी हो जाते थे कि क्या गौर वर्ण वाली राधा या गाँव की अन्य गोपियाँ कभी भी उन्हें उनके काले रंग के कारण पसंद करेंगी? जब यह बात उन्होंने अपनी माँ यशोदा से कही तो कृष्ण की हताशा को देखते हुए, माँ ने उन्हें जाकर राधा के चेहरे को किसी भी रंग से रंग देने को कहा। जब कृष्ण ने राधा को रंग लगाया, तो वे दोनों एक दूजे के हो गए और तब से होली पर रंगों से खेलने की परम्परा चल पड़ी।

रंग और रस का त्यौहार है होली

होली दहन के दूसरे दिन को रंगवाली होली, धुलंडी, फगवा या बादी होली कहा जाता है। यह वह दिन है जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, पार्टी करते हैं और आनंद लेते हैं। क्या बच्चे क्या बूढ़े, सभी होली की मस्ती में डूब जाते हैं। अबीर, गुलाल, पिचकारी, सूखे रंगों और पानी से भरे गुब्बारों के साथ मनाया जाता है मस्ती भरा यह त्यौहार। होली वाले दिन आपको अक्सर सड़कों पर संगीत वाद्ययंत्र के साथ नाचते और गाते हुए लोगों का समूह दिख जाएगा।

दिन के दौरान रंगों से खेलने के बाद, लोग शाम को नहा-धोकर अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं और उन्हें त्योहार की बधाई देते हैं। गुझिया, ठंडाई, गोल गप्पे, चाट, कचौरी,  दही भल्ले, छोले भटूरे, और विभिन्न प्रकार के नमकीन इस पर्व के आनंद को कई गुणा बढ़ा देते हैं।

देश के अलग- अलग हिस्सों में कैसे मनाई जाती है होली

देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से होली उत्सव मनाया जाता है। जहां पश्चिम बंगाल में होली को गायन और नृत्य के साथ डोल जात्रा के रूप में मनाया जाता है, वहीँ उत्तराखंड में, इसे शास्त्रीय रागों के गायन के साथ कुमाऊँनी होली के रूप में मनाया जाता है, दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इस दिन लोग प्रेम के देवता कामदेव की पूजा करते हैं।

उत्तर प्रदेश के ब्रज, मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगाँव जैसे वो स्थल जो भगवान कृष्ण के साथ जुड़े हुए हैं, उनकी होली खासी मशहूर है। बरसाना शहर लठ मार होली मनाता है, जहां महिलाएं पुरुषों की डंडों से पिटाई करती हैं, जबकि पुरुष खुद को बचाने के लिए ढाल लेकर दौड़ते हैं। यह और भी मज़ेदार और दिलचस्प तब हो जाता है जब लोग एक साथ मिलकर गायन और नृत्य करते हैं।

लेखिका:
विद्या सिंघानिया