कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, ठेका खेती या संविदा खेती

दोस्तों हम सभी जानते हैं कि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है, और अपने देश की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। हमारे यहाँ खेती सम्पूर्ण रूप से कुदरत पर निर्भर है और हम सभी जानते हैं कि कुदरत पर किसी का कन्ट्रोल नहीं है। हमारे यहाँ किसान खेती तो करता है परन्तु उसकी मेहनत पर कब कुदरत पानी फेर देगा यह किसी को भी पता नहीं रहता। मतलब किसान की खेती पर ही सबसे ज्यादा सूखा, बाढ़ , आंधी-तूफान आदि कुदरत के प्रकोप का प्रभाव पड़ता है। इसी सूखा या बारिष की वजह से खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है। अगर कुदरत के प्रकोप से बच गया तो किसान को उसके फसल का उचित मूल्य मिलना भी तय नहीं है। क्योंकि जब किसान के यहाँ फसल तैयार होती है उस समय सभी किसानों के यहाँ सबसे ज्यादा माल होता है और मण्डियों में भी ज्यादा माल होने के कारण किसान को मज़बूरी में कम दाम पर अपने माल को बेचना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो हमारे यहाँ किसानों की फसल के उचित दाम के लिए अभी तक सरकार की तरफ से कोई सफल सिस्टम नहीं है।

हमारे यहाँ आज भी कृषि कार्यों में टेक्नोलॉजी का बहुत कम प्रयोग होता है और किसान वही पुराने सिस्टम से ही खेती करना पसंद करते हैं। ज्यादातर किसान मौसमी खेती ही करते हैं, जैसे गेंहूँ, धान, चना, मटर इत्यादि। देश के विभिन्न हिस्सों में मौसम के अनुसार अलग – अलग तरह खेती भी की जाती है, परन्तु उससे किसानों को ज्यादा फायदा नहीं होता है। हमारी सरकार और कुछ निजी संस्थाएँ समय – समय पर कृषि के प्रति जागरूकता अभियान चलाते आये हैं परन्तु उसका भी कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला।

क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती? (What is Contract Farming)

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, अनुबंध खेती , ठेका खेती या संविदा खेती का मतलब है किसान और खरीददार के बीच का अनुबंध। इस अनुबंध के तहत किसान अपनी जमीन पर खेती तो करेगा परन्तु अपने लिए नहीं बल्कि खरीददार के लिए और खरीददार के अनुसार। खरीददार कोई भी हो सकता है जैसे कि कोई प्राइवेट कम्पनी, सरकारी संस्थाएँ या कोई बड़ा किसान भी। अब यह किसान और कॉन्ट्रैक्टर पर निर्भर करता है कि उन दोनों के बीच किस तरह का अनुबंध हुआ है?

अगर हम मोटे तौर पर बात करें तो इसमें किसान को अपना पैसा नहीं खर्च करना पड़ता है और कॉन्ट्रैक्टर ही सब कुछ उपलब्ध करता है, जैसे कि बीज, खाद व पानी इत्यादि। और फसल तैयार होने पर वही कॉन्ट्रैक्टर फसल को खरीदता है। परन्तु यहाँ हम कॉन्ट्रैक्ट के प्रकार तथा टर्म और कंडीशन के बारे में विस्तृत बात नहीं कर रहे हैं। इसका विवरण आपको हमारे अगले लेख में मिल जायेगा।

कॉन्ट्रैक्ट खेती के फायदे क्या हैं?

अगर हम इसके फायदे की बात करें तो इसको निम्नलिखित प्रकार से विभाजित किया जा सकता है – 

१ – कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से किसानों को फायदा:-

(A) इसमें किसानों के फायदे के साथ – साथ खेती की दशा और दिशा भी सुधरती है => अगर किसानों को आधुनिक खेती के बारे में फसल की बुवाई से पहले प्रशिक्षण मिल जाये तो वह अपनी खेती बेहतर तरीके से कर सकता है।

(B) बाजार के उतार चढ़ाव के जोखिम से किसान मुक्त => कॉन्ट्रैक्ट करते समय अगर फसल का दाम तय हो जाता है तो किसान को बाजार के उतार – चढ़ाव का प्रभाव नहीं पड़ेगा।

(C) किसानों को बड़ा बाजार मिलता है => किसान को किस खरीददार से अनुबंध करना है यह पूरी तरह किसान पर निर्भर है। इससे किसान को एक बड़ा बाजार मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

(D) किसान को सीखने का अवसर => आज भी हमारे यहाँ खेती में पुराने तरीके ही ज्यादातर प्रयोग किये जाते हैं। क्योंकि आधुनिक तरीकों के बारे में किसानों को ज्यादा पता नहीं चल पाता है। कॉन्ट्रैक्ट की खेती से किसानों को कंपनियों से नए तरीके सीखने का अवसर मिलेगा।

(E) खेती के तरीकों में सुधार => कंपनियों की मदद से किसान नए तरीके की खेती के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

(F) फसल की क्वालिटी और मात्रा में सुधार => अगर किसान अच्छे बीज और नए तरीके से खेती करते हैं तो पैदावार में वृद्धि के साथ – साथ फसल की क्वालिटी भी अच्छी होगी।

२ – कॉन्ट्रैक्टर या कंपनी का फायदा:-

कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से कांट्रेक्टर या कंपनियों को भी फायदा मिलेगा – 

(A) कंपनी को यह पता होगा की उसको किस समय और कितना फसल मिलने वाला है? जिससे उनको अलग – अलग बाजार में नहीं जाना पड़ेगा।

(B) कंपनी अपनी आवश्यक्तानुसार फसल की क्वालिटी को निर्धारित कर सकती हैं।

(C) कंपनी को फसल की लागत पहले से ही पता होगी जिससे वह अपने सामान के मूल्य का निर्धारण आसानी से कर सकती है।

(D) कॉन्ट्रैक्टर अपनी आवश्यकता के अनुसार फसल की पैदावार करवा सकता है। 

कॉन्ट्रैक्ट खेती की चुनौतियाँ या दुविधाएँ

जैसा की हम सब जानते हैं कि हमारे किसान आज भी कम पढ़े लिखे हैं और कॉन्ट्रैक्ट में लिखी चीजों को समझना मुश्किल होगा। इसको हम निम्न भागों में विभाजित करके समझ सकते हैं – 

* बड़े खरीददारों के एकाधिकार को बढ़ावा।

* कम कीमत देकर किसानों के शोषण का डर।

* सामान्य किसानों के लिए समझना मुश्किल।

* छोटे किसानों को इसका काम फायदा होगा।

* कंपनियां किसानों के कम पढ़े लिखे होने का फायदा उठाकर कॉन्ट्रैक्ट के साथ कभी कभी छेड़छाड़ कर सकतीं हैं।

* अगर दोनों के बीच कोई समस्या होती है तो बेवजह किसान को परेशान होना पड़ेगा।