बसंत के आगमन को सूचित करता है वसंत पंचमी का त्यौहार

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवः सदा पूजिता, सामां पातु सरस्वति भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

Saraswati vandana in sanskrit

अर्थाथ, जो विद्या की देवी माँ सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल, उज्जवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा शोभित है, जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं और जो ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा पूजी जाती हैं, वही जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें।

वसंत का अर्थ है ऋतुराज, और पंचमी का अर्थ है पांचवां दिन, यानी कि वसंत ऋतू की पंचमी तिथि को मनाये जाने वाले पर्व को बसंत पंचमी का नाम दिया गया है। माघ महीने के शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन मनाई जाती है बसंत पंचमी, जो आमतौर पर जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में पड़ती है। इसे वसंत के आरम्भ के रूप में मनाया जाता है।

शीत की विदाई और बसंत के आगमन के साथ पेड़ पौधों और प्राणियों में नयी उर्जा का संचार होता है। चारों तरफ हरियाली और महकते फूलों के श्रृंगार से प्रकृति खिल उठती है। हल्की हवा और खेत खलिहानों में पीली सरसों से वातावरण सुहाना हो जाता है, और ऐसे सुहाने मौसम का स्वागत किया जाता है बसंत पंचमी के पर्व के साथ।

माँ सरस्वती को समर्पित है बसंत पंचमी

माँ सरस्वती की उत्पत्ति के बारे में पुराणों में कहा गया है कि बसंत पंचमी के दिन, सृष्टि के रचियता, ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल का जल हाथ में लेकर चारों दिशाओं में छिड़का। इस जल से वीणा धारण किए जो शक्ति प्रकट हुई वह मां सरस्वती कहलाई। जैसे ही माँ शारदा ने वीणा के तार छेड़े वैसे ही तीनो लोकों में ऊर्जा का संचार हुआ और वाणी का जन्म हुआ। इसी कारण बसंत पंचमी को माँ शारदा का दिन भी माना जाता है।

बिहार और भारत के पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम में लोग इस दिन घरों या पंडालों में माँ सरस्वती की पूजा करते हैं। अधिकांश विद्यालयों में छात्रों के लिए विशेष सरस्वती पूजा की व्यवस्था की जाती है। आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में, इस दिन को श्री पंचमी कहा जाता है जहां श्री शब्द का इस्तेमाल देवी के दूसरे पहलू के लिए होता है।

सरस्वती पूजा का महत्व

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार देवी सरस्वती ज्ञान, भाषा, संगीत और सभी कलाओं की देवी हैं। वाग्देवी और वीणावादिनी जैसे नामों से भी जाने जाने वाली, माँ सरस्वती ब्रह्मा की ऊर्जा हैं, और अपने सभी रूपों में रचनात्मक ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक भी। चार भुजाओं वाली माँ सरस्वती, एक हाथ में वीणा, दूसरे में कमंडल, तीसरे में वेद तथा चौथे में रूद्राक्ष की माला धारण किए हुए हैं। वीणा जहाँ संगीत का प्रतीक है वहीँ वेद विद्या व ज्ञान का प्रतीक है। कमंडल व रुद्राक्ष की माला जप, ध्यान तथा मानसिक शांति को प्रकट करते हैं।

ज्ञान और कौशल इस पृथ्वी पर किसी भी कार्य की महत्वपूर्ण आवश्यकता हैं। देवी सरस्वती सभी ज्ञान, कौशल, प्रौद्योगिकी और कला का स्रोत हैं। इसलिए भक्ति और विश्वास के साथ उनकी पूजा करने से मनुष्य में ज्ञान, योग्यता, प्रतिभा, कलात्मक और तकनीकी क्षमताओं का विकास होता है।माँ सरस्वती मन से भ्रम दूर कर विचारों की स्पष्टता भी प्रदान करती हैं।

बसंत पंचमी – उत्सव

basant panchami ka mahatva in hindi

इस दिन पीले रंग पर विशेष महत्व होता है। पीला रंग देवी सरस्वती के साथ-साथ सरसों की फसल से जुड़ा है। यह त्योहार वसंत के मौसम का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए पीला रंग इस त्योहार का एक अभिन्न हिस्सा है। पीले कपड़े पहनना इस दिन विशेष तौर पर शुभ माना जाता है, इस पर्व पर अक्सर युवा लड़कियां और महिलाएं पीले रंग की साड़ियों में नज़र आती हैं।

माँ सरस्वती के प्रसाद के लिए भी पीले रंग की मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं। केसरिया भात या मीठे केसर चावल, केसरिया लड्डू या हलवा, खिचड़ी इत्यादि माँ सरस्वती को भोग के रूप में समर्पित की जाती है। गेंदे जौर अन्य पीले फूलों से माँ की अर्चना की जाती है। वसंत के मौसम का आनंद उठाने और फसलों के पकने की ख़ुशी में लोग पतंग उड़ाकर भी इस अवसर को मनाते हैं।

पंजाब में, सिख समुदाय गुरुद्वारे में बहुत धूमधाम के साथ इस त्यौहार को मनाता है। पंजाब के कई हिस्सों में इस दिन मेले लगते हैं। गुरू गोविंद सिंह का विवाह इसी दिन हुआ था और इसलिए यह दिन सिख समुदाय के लिए ख़ास महत्व रखता है।

बसंत पंचमी से जुड़ी कामदेव और रति की कथा

अपनी पत्नी सती के निधन के बाद,शिव ने संसार त्याग दिया और स्वयं हिमालय में रहने चले गए। शिव के तपस्या पर चले जाने से सृष्टि चक्र बाधित न हो जाए इसलिए ब्रह्मा द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार, सभी देवताओं ने महादेवी की पूजा की, जिन्होंने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेने और शिव से शादी करने का वादा किया ताकि शिव अपने एकांत से वापस आ सकें।

पार्वती रूप में जन्म लेने के बाद माँ ने भगवान् शिव को पति के रूप में पाने के लिए गहरी तपस्या की। परन्तु उनकी तपस्या शिव को लुभाने और उन्हें अपने ध्यान से बाहर लाने में विफल रही। तब देवताओं ने भगवान् शिव में प्रेम प्रज्ज्वलित कर, तपस्या से बाहर लाने के लिए कामदेव से अनुरोध किया। देवताओं के अनुरोध को मानते हुए, कामदेव ने भगवान शिव पर अपने पुष्प बाणों की वर्षा की, जिससे पार्वती के लिए भगवान शिव के दिल में भावनाओं का जन्म हुआ और वे अपने ध्यान से बाहर आ गए। देश के कुछ हिस्सों में इस घटना को वसंत पंचमी के पर्व के रूप में मनाया जाता है और शिव-पार्वती की पूजा की जाती है।

लेखिका:
विद्या सिंघानिया

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