सिमोन बाबा : जिसकी कुदाल ने बना डाले तीन बांध और बदल दी 5 गांवों की किस्मत

simon baba built 3 dams in jharkhandदोस्तों, अगर चींटी दीवार पर चढ़ने से पहले उसकी ऊंचाई की तुलना अपने नन्हें पैरों से करने लगे, तो कभी-भी वो दीवार पर चढ़ने का दुस्साहस न करे। लेकिन ये भी सच है कि साहस करने से तो सफलता मिलती है, लेकिन दुस्साहस करने से आप इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। जैसे सिकंदर ‘महान’ और परमवीर अब्दुल हमीद बन गए। कुछ ऐसा ही दुस्साहस झारखंड निवासी 83 वर्षीय सिमोन उरांव ने पांच दशक पहले किया था, उन्होंने गांव में तीन बांध बना डाले, जिसके कारण आज उनके गांव में ही नहीं, आस-पास के गांवों में भी पानी की कोई किल्लत नहीं रही। इस साल के पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित ‘सिमोन बाबा’ का ये अद्भुत कारनामा किसी भी साहस से परे है। सिमोन बाबा की हिम्मत और हौसले ने जब ज़िद बनना शुरू किया, तब उन्होंने पानी को तरसते अपने गांव में सिंचाई का पानी पहुंचाने की ठान ली।

कुछ कर गुजरने का ज़ज़्बा
यदि व्यक्ति के अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो रास्ते में कितनी भी अड़चनें आयें, फिर भी उसका बाल भी बांका नहीं कर सकतीं हैं। अनपढ़ सिमोन के पास न तो कोई तकनीक थी, और न ही हाथ में पैसे। उनके पास कुछ था, तो सिर्फ़ ज़िद और कुछ कर गुजरने का ज़ज़्बा। उन्हें केवल एक ही लक्ष्य (Target) दिखाई देता था कि सूखे खेतों तक पानी कैसे पहुंचाया जाये। उन्होंने नारा दिया, ‘जमीन से लड़ो, मनुष्य से नहीं’।

जहां आसमां को ज़िद है बिजलियां गिराने की, हमे भी ज़िद है वहीं आशियां बनाने की।
आंधियों से कोई कह दो औकात में रहें, एक तिनके ने की है हिम्मत सर उठाने की॥

रांची में रहने वाले सिमोन उरांव ने अपने हौसले पर उम्र को कभी हावी होने नहीं दिया। अब भी कुदाल लेकर कभी खेतों में नज़र आते हैं, तो कभी गांव वालों का झगड़ा सुलझाते हुए। बाबा के नाम से प्रसिद्ध सिमोन ने वह कारनामा कर दिखाया, जो सरकार करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी नहीं कर पाई।

अब साल में तीन फ़सलें उगाई जाती हैं
आज उनके बनाए बांधों से पांच गांवों की सूरत बदल गई है। एक ब्लॉक की यह कहानी पूरे झारखंड के लिए मिसाल बन गई। सिंचाई सुविधा के अभाव में जहां एक फ़सल उगाना मुमकिन नहीं था, वहां साल में तीन फ़सलें उगाई जाने लगीं। वो जब कुदाल लेकर अकेले निकल पड़े, हर कोई उन पर हंसता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे ग्रामीणों का साथ मिला और ये शुरूआत एक मिशन बन गई। उन्होंने छोटी-छोटी नहरों को मिलाकर तीन बांध बना डाले। आज इन्हीं बांधों से करीब 5000 फीट लंबी नहर निकाल कर खेतों तक पानी पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा जब ग्रामीण हाथियों के आंतक से त्रस्त थे, बाबा ने युवाओं को एकत्र किया। हर युवक को 20-20 रुपए देकर रात का पहरा कराया और वन विभाग के सहयोग से हाथियों को खदेड़ा।

हर मर्ज़ का इलाज़ करते हैं सिमोन बाबा
उन्होंने ग्रामीणों की आर्थिक समस्याएं दूर करने के लिए फंड बनाया। बैंक में खाता खुलवाया। अब ग्रामीणों को ज़रुरत के समय इसी फंड से 10-10 हजार रुपए की सहायता दी जाती है। किसी गरीब की बेटी की शादी हो, तो दो-दो क्विंटल चावल भी दिया जाता है। वे देशी जड़ी-बूटी से रोगियों का इलाज भी करते हैं।

आदमी से नहीं, जमीन से लड़ो
सिमोन बाबा कहते हैं अगर विकास करना है तो आदमी से नहीं, जमीन से लड़ो। अगर विनाश करना है तो आदमी से लड़ो। वे कहते हैं कि देखो, सीखो, करो, खाओ और दूसरों को खिलाओ। वे 1952 से अपने क्षेत्र के पड़हा राजा (जनजातीय परंपरा के अनुसार) हैं। वे कहते हैं जिसने ढाई आखर प्रेम का पढ़ा है, वह घर भी चलायेगा और परिवार भी चलायेगा।

कई सम्मान भी मिले
सिमोन बाबा को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किये गये उल्लेखनीय कार्यो के लिए कई सम्मान मिले हैं। उन्हें अमेरिकन मेडल ऑफ ऑनर लिमिटेड स्ट्राकिंग 2002 पुरस्कार के लिए चुना गया था। अमेरिका के बायोग्राफिक इंस्टीटय़ूट के अध्यक्ष जेएम हवांस ने इनके काम को सराहा। विकास भारती, विशुनपुर से जल मित्र सम्मान व झारखंड सरकार की ओर से भी 2008 में स्थापना दिवस के अवसर पर सम्मान मिला। इसके अलावा भी उन्हें कई दूसरे कृषि व पर्यावरण सम्मान मिले हैं। पद्मश्री के लिए भी उनके नाम की सिफारिश हुई थी। ग्रेट ब्रिटेन के नाटिंघम विश्वविद्यालय में वर्तमान में Lecturer के रूप में काम कर रही सारा जेविट ने अपने पीएचडी के दौरान लंबा समय उनके साथ उनके गांव में गुजारा। उन्होंने उनके बारे में लिखा था कि मैं पूरे बिहार (एकीकृत बिहार) में घूमी, लेकिन आपके जैसा इनसान नहीं देखा। कुछ वर्ष पूर्व उनके भेजे एक संदेश में उन्होंने फिर से झारखंड आने और उनसे मिलने की इच्छा जतायी थी।

अवॉर्ड किसानों को समर्पित
सिमोन बाबा को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया, तो उन्होंने अपना यह सम्मान गांव वालों के नाम समर्पित कर दिया। “पद्मश्री मिलना मेरे और झारखंड के लिए गौरव की बात है। यह अवार्ड मैं उन तमाम किसानों को समर्पित करना चाहूंगा, जिनके सहयोग से मुझे यह मुकाम हासिल हुआ है।”

गांव में किसी प्रकार का विवाद हो, तो सुलझाने के लिए बाबा को ही बुलाया जाता है। आज दुनिया भर में उनकी इस हिम्मत की चर्चा हो रही है। सच ही कहा गया है, ‘किसने कहा आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों…

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