सन्नाटा

गुजरती हैं आवाजें गलियों के सन्नाटो में जब
एक दर्द व्याकुलता सा आलम होता
चौक जाते हैं, दस्तक देती आवाजों से
गलिओं में अक्सर सन्नाटा पाता

व्याकुलता भर जाती आँखों में
रातों को कौन पुकार रहा
कराह, तड़प, रुदन भरी है
भटक रही किसे पहचान रहा

कम्पन करते तन को अपने
काबू में कर पाता
निस्चर खग की अकुलाहट
भ्रामक वन, तन पर छा जाता

रूह रूह में कम्पन हो जाता
हिम्मत तब तक न हारा था
कदम हमारे आगे ही बढ़े थे
गलियों में सन्नाटा छाया था॥

चन्द्रहास मौर्या
गोरखपुर

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  1. By Servo

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