राम प्रसाद बिस्मिल

Ram Prasad Bismilहिंदुस्तान का इतिहास वीरों और बलिदानियों से भरा हुआ है। भारत माता की तरफ जब भी किसी ने बुरी नजर से देखा तब-तब हमारे देश के वीर सपूतों ने उन्हें मुँह तोड़ जवाब दिया है। हमारे देश को फिरंगियों की गुलामी से आजाद कराने के लिये न जाने कितनी माँओं की गोद सूनी हो गई, सुहागिनें विधवा हो गईं और अनगिनत लोग अपने भाई-बहन, माँ-बाप एवं परिवार से बिछड़ गये। अनेकों लोग क्रन्तिकारी बने और अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करते हुए देश के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिये।

हम जब भी भारत माता के उन वीर सपूतों व महान क्रांतिकारियों को याद करते हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया, राम प्रसाद बिस्मिल उनमें से एक हैं। राम प्रसाद बिस्मिल एक महान क्रन्तिकारी ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाविद् व साहित्यकार भी थे। इन्होने अपनी बहादुरी और सूझ-बूझ से अंग्रेजी हुकुमत की नींद उड़ा दी और भारत की आज़ादी के लिये मात्र 30 साल की उम्र में अपने प्राणों की आहुति दे दी। ‘बिस्मिल’ उपनाम के अतिरिक्त वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘सरफरोशी की तमन्ना..’ गाते हुए न जाने कितने क्रन्तिकारी देश की आजादी के लिए फाँसी के तख्ते पर झूल गये। राम प्रसाद बिस्मिल ने ‘मैनपुरी कांड’ और ‘काकोरी कांड’ को अंजाम देकर अंग्रेजी साम्राज्य को हिला दिया था। लगभग 11 वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और स्वयं ही उन्हें प्रकाशित किया। उनके जीवन काल में प्रकाशित हुई लगभग सभी पुस्तकों को ब्रिटिश सरकार ने ज़ब्त कर लिया था।

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। जब राम प्रसाद सात वर्ष के हुए तब पिता पंडित मुरलीधर घर पर ही उन्हें हिन्दी अक्षरों का ज्ञान कराने लगे। उस समय उर्दू का भी बोलबाला था इसलिए हिन्दी शिक्षा के साथ-साथ बालक को उर्दू पढ़ने के लिए घर के पास एक मौलवी साहब के यहाँ जाते थे। उनके पिता पंडित मुरलीधर राम प्रसाद की शिक्षा पर विशेष ध्यान देते थे और पढ़ाई के मामले में जरा भी लापरवाही करने पर मार भी पड़ती थी।

आठवीं कक्षा तक वो हमेश कक्षा में प्रथम आते थे, परन्तु कुसंगति के कारण उर्दू मिडिल परीक्षा में वह लगातार दो वर्ष अनुत्तीर्ण हो गए। राम प्रसाद की इस अवनति से सभी को बहत दु:ख हुआ और दो बार एक ही परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर उनका मन भी उर्दू की पढ़ाई से उठ गया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ी पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। उनके पिता अंग्रेज़ी पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे पर रामप्रसाद की मां के कहने पर मान गए। नवीं कक्षा में जाने के बाद रामप्रसाद आर्य समाज के सम्पर्क में आये और उसके बाद उनके जीवन की दशा ही बदल गई। आर्य समाज मंदिर शाहजहाँपुर में वह स्वामी सोमदेव के संपर्क में आये। जब रामप्रसाद बिस्मिल 18 वर्ष के थे तब स्वाधीनता सेनानी भाई परमानन्द को ब्रिटिश सरकार ने ‘ग़दर षड्यंत्र’ में शामिल होने के लिए फांसी की सजा सुनाई (जो बाद में आजीवन कारावास में तब्दील कर दी गयी और फिर 1920 में उन्हें रिहा भी कर दिया गया)। यह खबर पढ़कर रामप्रसाद बहुत विचलित हुए और ‘मेरा जन्म’ शीर्षक से एक कविता लिखी और उसे स्वामी सोमदेव को दिखाया। इस कविता में देश को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने की प्रतिबद्धिता दिखाई दी।

राम प्रसाद बिस्मिल कविता संग्रह

इसके बाद रामप्रसाद ने पढ़ाई छोड़ दी और सन् 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान कांग्रेस के नरम दल के विरोध के बावजूद लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की पूरे लखनऊ शहर में शोभायात्रा निकाली। इसी अधिवेशन के दौरान उनकी मुलाकात केशव बलिराम हेडगेवार, सोमदेव शर्मा व मुकुन्दीलाल आदि से हुआ। इसके बाद कुछ साथियों की मदद से उन्होंने ‘अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रकाशित होते ही प्रतिबंधित कर दिया।

रामप्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ने और देश को आज़ाद कराने के लिए ‘मातृदेवी’ नाम की एक क्रन्तिकारी संगठन की स्थापना की। इस कार्य के लिए उन्होंने औरैया के पंडित गेंदा लाल दीक्षित की मदद ली। स्वामी सोमदेव चाहते थे कि इस कार्य में रामप्रसाद की मदद कोई अनुभवी व्यक्ति करे इस कारण उन्होंने उनका परिचय पंडित गेंदा लाल से करवाया। रामप्रसाद बिस्मिल की तरह पंडित जी ने भी ‘शिवाजी समिति’ नाम की एक क्रन्तिकारी संगठन की स्थापना की थी। दोनों ने मिलकर इटावा, मैनपुरी, आगरा और शाहजहाँपुर जिलों के युवकों को देश सेवा के लिए संगठित किया। जनवरी 1918 में बिस्मिल ने ‘देशवासियों के नाम सन्देश’ नाम का एक पैम्फलेट प्रकाशित किया और अपनी कविता ‘मैनपुरी की प्रतिज्ञा’ के साथ-साथ इसका भी वितरण करने लगे। सन 1918 में उन्होंने अपने संगठन को मजबूत करने के लिए 3 बार डकैती भी डाली। 1918 में कांग्रेस के दिल्ली अधिवेसन के दौरान पुलिस ने उनको और उनके संगठन के दूसरे सदस्यों को प्रतिबंधित साहित्य बेचने के लिए छापा डाला पर बिस्मिल भागने में सफल रहे। पुलिस से मुठभेड़ के बाद उन्होंने यमुना नदी में छलांग लगा दी और तैर कर बीहड़ों में चले गए। इन बीहड़ों में घनघोर बबूल के वृक्ष और झाड़ियाँ थीं जिससे इंसान कहीं दूर-दूर तक नहीं दीखता था। उधर ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ मुकदमे में ब्रिटिश जज ने फैसला सुनते हुए बिस्मिल और दीक्षित को भगोड़ा घोषित कर दिया।

राम प्रसाद बिस्मिल ने ग्रेटर नॉएडा के एक छोटे से गाँव रामपुर जागीर में शरण ली और कई महीने यहाँ के निर्जन जंगलों में घूमते रहे। इसी दौरान उन्होंने अपना क्रान्तिकारी उपन्यास ‘बोल्शेविकों की करतूत’ लिखा और ‘यौगिक साधन’ का हिन्दी अनुवाद भी किया। इसके बाद बिस्मिल कुछ समय तक इधर-उधर भटकते रहे और जब फरवरी 1920 में सरकार ने ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ के सभी बंदियों को रिहा कर दिया तब वो भी शाहजहाँपुर वापस लौट गए।

सितम्बर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वो शाहजहाँपुर काँग्रेस कमेटी के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। वहां उनकी मुलाकात लाला लाजपत राय से हुई, जो उनकी लिखी हुई पुस्तकों से बहुत प्रभावित हुए और उनका परिचय कलकत्ता के कुछ प्रकाशकों से करा दिया। इन्ही प्रकाशकों में से एक उमादत्त शर्मा ने आगे चलकर सन् 1922 में राम प्रसाद बिस्मिल की एक पुस्तक कैथेराइन छापी थी।

सन 1921 में उन्होंने कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में भाग लिया और मौलाना हसरत मोहनी के साथ मिलकर ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव कांग्रेस के साधारण सभा में पारित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शाहजहाँपुर लौटकर उन्होंने लोगों को ‘असहयोग आन्दोलन’ में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। जब चौरीचौरा काण्ड के पश्चात गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया तो सन 1922 के गया अधिवेशन में बिस्मिल व उनके साथियों के विरोध स्वरुप कांग्रेस में फिर दो विचारधारायें बन गयीं; एक उदारवादी और दूसरी विद्रोही।

सितम्बर 1923 में हुए दिल्ली के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में असन्तुष्ट नवयुवकों ने एक क्रन्तिकारी पार्टी बनाने का निर्णय किया। सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी लाला हरदयाल, जो उन दिनों विदेश में रहकर देश की आजादी का प्रयत्न कर रहे थे, ने पत्र लिखकर राम प्रसाद बिस्मिल को शचींद्रनाथ सान्याल व यदु गोपाल मुखर्जी से मिलकर नयी पार्टी का संविधान तैयार करने की सलाह दी थी। 3 अक्टूबर 1924 को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की एक बैठक कानपुर में की गयी जिसमें शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेश चन्द्र चटर्जी व राम प्रसाद बिस्मिल आदि कई प्रमुख सदस्य शामिल हुए। पार्टी के लिये फण्ड एकत्र करने के लिए 25 दिसम्बर 1924 को बमरौली में डकैती डाली गयी।

पार्टी के कार्य हेतु धन की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए बिस्मिल ने सरकारी खजाना लूटने की योजना बनायीं और उनके नेतृत्व में कुल 10 लोगों (जिनमें अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी शर्मा और बनवारी लाल आदि शामिल थे) ने लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन पर ट्रेन रोककर 9 अगस्त 1925 को सरकारी खजाना लूट लिया। 26 सितम्बर 1925 को बिस्मिल के साथ पूरे देश में 40 से भी अधिक लोगों को काकोरी डकैती (काकोरी कांड) मामले में गिरफ्तार कर लिया गया।

रामप्रसाद बिस्मिल को अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह के साथ मौत की सजा सुनाई गयी। 16 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया। 18 दिसम्बर 1927 को माता-पिता से अन्तिम मुलाकात की और सोमवार 19 दिसम्बर 1927 को प्रात:काल 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बहुत बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गयी। जेल का मुख्य द्वार बन्द ही रक्खा गया और फाँसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया। शव को डेढ़ लाख लोगों ने जुलूस निकाल कर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उसका अन्तिम संस्कार कर दिया।

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