मन मार के

आये थे हरि भजन को, औटन लगे कपास।

मंजिल को देखा ही नहीं, दौड़ पड़े मन में ले के आस।

कुछ दाएं में कुछ बाएं में, खींचा-तानी कर डाला।

जब आयी अपनी बारी, तो सारा कानून बदल डाला।

ये स्वप्न नहीं सच्चाई है, तू मानव नहीं कसाई है।

रोज जलाता है बाजू वालों को, फिर गाली देता है घर वालों को।

तू करता क्या है इस दुनियां में, क्यों मरता है दुनियां वालों पे।

क्या तेरा वजूद है, जब तू मौजूद नहीं है खुद में।

इस दुनियाँ की भगदड़ में, भ्रस्टाचार के कीचड़ में।

कौन कमल उगायेगा, जब तू ही इसमें फंस जायेगा।

उठ बहुत हुआ ये नंगा नाच, अब न होगी इसकी आंच।

आज ही निर्णय लेते हैं, कल को सफल बनायेंगे।

आने वाली मुश्किल को, हँस के पार लगायेंगे॥
Ramendra Soch Aapki
रामेन्द्र कुमार
फतेहपुर (उ. प्र.)

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