Maa Shailputri (मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि के पहले दिन की जाती है)

“नवरात्री” भारत और विश्व के कई स्थानो में मनाया जाने वाला हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। नवरात्री या नव रात्रि का मतलब नौ दिन से है जो की पूरी तरह से माँ दुर्गा और माँ आदिशक्ति के नौ रूपों को समर्पित है। हिन्दू मान्यता के अनुसार नवरात्री एक वर्ष में चार बार आता है जबकि यह विश्व के कई स्थानो पर हिन्दुओं और कुछ सिक्खों द्वारा एक या दो बार मनाया जाता है। बंगाली लोग इस त्यौहार को वर्ष में सिर्फ एक बार दशहरा के पहले मानते हैं।

नवरात्र: माताओं के नौ रूपों के नाम … Maa Shailputri pooja in Navaratra
१. माँ शैलपुत्री
२. माँ ब्रह्मचारिणी
३. माँ चंद्रघंटा
४. माँ कुष्मांडा
५. माँ स्कंदमाता
६. माँ कात्यायनी
७. माँ कालरात्रि
८. माँ महागौरी
९. माँ सिद्धिदात्री

नवरात्री का प्रथम दिन माता शैलपुत्री को समर्पित है!

इस दिन माँ शैलपुत्री की पूजा इस मंत्र से प्रारम्भ करते हैं…

वंदे वाद्द्रिछतलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम ।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्‌ ॥

शैलपुत्री माँ दुर्गा की पहली स्वरुप शैलराज हिमालय की पुत्री हैं, जिनके नाम के साथ दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाती है। नवरात्र पूजा के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उपासना कलश स्थापना के साथ की जाती है। माता शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल का फूल रहता है और इनकी सवारी वृषभ है। नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है। प्राचीन कथाओं के अनुसार माँ शैलपुत्री अपने पूर्व जन्मा में कन्या के रूप में प्रजापति दक्ष के घर पैदा हुई थीं, उस समय माता का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ था और इनका नाम सती था । एक बार की बात है प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया किन्तु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया। यज्ञ की सूचना जानकर अपने माँ और बहनो से मिलने को आतुर माँ सती बिना निमंत्रण के ही अपने पिता के घर जा पहुंची जहाँ उनको अपने और भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार अपने ही पिता के द्वारा मिल। माँ सती अपने और भगवन शंकर के इस तिरस्कार को सहन ना कर सकी और वहीं योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया। शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को शैल पुत्री कहा जाता है।

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