कर्म करो फल की चिंता मत करो

“कर्म करो फल की चिंता मत करो”, कर्म ही पूजा है, इस तरह के बहुत से कथन आपने अपने बुजुर्गों से बहुत सुने होंगे। यहाँ तक कि भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है – “कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन। माँ कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” अर्थात “कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर कभी नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा तेरा कर्म ना करने में भी कोई आसक्ति न हो॥” ऐसी ही एक कहानी आपके सामने रख रहा हूँ, उम्मीद है कि आपको पसन्द आयेगी।

बहुत समय पहले की बात है, एक बार भगवान और देवराज इंद्र में इस बात पर बहस छिड़ गई कि दोनों में से श्रेष्ठ कौन हैं? उनका विवाद बढ़ गया, तभी अचानक इंद्र के मन में विचार आया की यदि पृथ्वी पर कुछ सालों तक बारिश बंद हो जाय तो पृथ्वी में हाहाकार मच जायेगा और लोग त्राहि-त्राहि करने लगेंगे। तब भगवान पृथ्वीवासियों को कैसे जीवित रख पाएंगे। इंद्र ने बादलों को आदेश दिया कि पृथ्वी पर एक बूँद भी जल न बरसायें। इंद्र की आज्ञा से बादलों ने वर्षा करना बंद कर दिया।

कर्म करो फल की चिंता मत करोधरती पर अकाल पड़ने के कारण किसानों में हाहाकार मच गया। किंतु किसानों ने सोचा कि यदि यह लड़ाई बारह वर्षों तक चलती रही तो वे अपना कर्म ही भूल बैठेंगे। उनकी आने वाली संताने भी सब कुछ भूल जाएंगे। अतः उन्हें अपना कर्म करते रहना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने कृषि कार्य शुरू कर दिया। वे अपने-अपने खेत जोतने लगे। तभी मिट्टी के नीचे छिपा कर मेढ़क बाहर आया और किसानों को खेती करते देख आश्चर्यचकित होकर बोला- “इंद्र देव और भगवान में श्रेष्ठता की लड़ाई छिड़ी हुई है। इसी कारण इंद्र देव ने बारह वर्षों तक पृथ्वी पर वर्षा न करने का निश्चय किया है। फिर भी आप लोग खेत जोत रहे हैं! यदि वर्षा ही न हुई तो खेत जोतने का क्या लाभ?”

किसान बोले- “मेढ़क भाई! यदि उनकी लड़ाई वर्षों तक चलती रही तो हम अपना कर्म ही भूल जाएंगे। इसलिए हमें अपना कर्म तो करते ही रहना चाहिए।” मेढ़क ने सोचा- “तो मैं भी टर्राता हूं, नहीं तो मैं भी टर्राना भूल जाऊंगा। तब वह भी टर्राने लगा।” उसने टर्राना शुरू किया तो मोर ने भी इंद्र एवं भगवान के मध्य लड़ाई की बात कही। मेढ़क बोला- “मोर भाई! हमें तो अपना कर्म करते ही रहना चाहिए, चाहे दूसरे अपने कार्य भूल जाएं। क्योंकि यदि हम अपने कर्म भूल जाएंगे तो आने वाली पीढ़ी को कैसे मालूम होगा कि उन्हें क्या कर्म करने हैं। अतः सबको अपना कर्म करने चाहिएं। फल क्या और कब मिलता है, यह ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।”

मेढ़क की बात सुनकर मोर भी पिहू-पिहू बोलने लगा। देवराज इंद्र ने जब देखा कि सभी प्राणी अपने-अपने कार्य में लगे हैं तो उन्होंने सोचा कि “शायद इन्हें ज्ञात नहीं है कि मैं बारह वर्षों तक नहीं बरसूंगा। इसलिए ये अपने कर्म कर रहे हैं। मुझे जाकर इन्हें सत्य बताना चाहिए।” यह सोचकर वे पृथ्वी पर आए और किसानों से बोले- “ये क्या कर रहे हो?” किसान बोले- “भगवन! हमारा कर्म ही ईश्वर है। आप अपना कार्य करें अथवा न करें, हमें तो अपना कर्म करते ही रहना है।”

किसानों की बात सुन देवराज इंद्र को अपने आप पर शर्म महशूश हुई कि इंसान होकर सब अपने कार्य में लगे हुए हैं और हम आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहते हैं। देवराज इन्द्र पृथ्वीवासियों से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने तुरंत बादलों को बरसने का आदेश दिया कि वे पृथ्वी पर घनघोर बरसें।

दोस्तों हमारे रास्ते में कितनी भी रूकावट क्यों न आयें, हमें मेहनत और लगन से बिना फल की चिंता किये अपना कार्य करते रहना चाहिये। क्योंकि कर्म ही पूजा है और कर्म के आगे खुद भगवान को भी झुकना पड़ता है।

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