Holi Festival

Holi festival essay in hindiभारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है इसलिए विभिन्न धर्मों के मानने वाले लोग यहाँ पे रहते हैं। जैसे कि हम जानते हैं कि प्रत्येक धर्म के अपने अलग – अलग पर्व और त्यौहार होते हैं। इसी तरह हिन्दू धर्म में बहुत सारे त्यौहार प्रति वर्ष मनाये जाते हैं। होली उनमें से एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह बसंत ऋतु में फाल्गुन मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली एक आपसी सौहार्द और भाईचारे का त्यौहार है। इस दिन लोग अपने पुराने गिले – शिकवे भूलकर एक दूसरे से गले मिलकर एक नई शुरुवात करते हैं। लोकप्रियता के चलते अन्य देशों में रहने वाले हिन्दू भी होली का त्यौहार धूमधाम से मानते हैं।

होली पर्व की तैयारियां लोग काफी दिनों पहले वषंतपंचमी से ही शुरू कर देते हैं। गावों में महीनों पहले से लोग ढोल, मजीरे और झाँझ के साथ नृत्य, संगीत का आनंद लेते हैं ‘फ़ाग’ गाते हैं। बच्चे और बड़े सभी मिलकर घास-फूस व लकड़ियाँ इक्टठा करके होली में डालते हैं।

होली के एक दिन पहले शाम को होलिका दहन होता है जिसमे लोग गेहूँ की बाल ले के भूनते है और उसे खाते हैं। दूसरे दिन सभी लोग एक-दूसरे के माथे पर गुलाल लगाकर गले मिलते हैं, होली की शुभकामनायें देते हैं तथा मिठईयाँ और पकवान खाते हैं। कहते है होली के दिन लोग दुश्मनी भूलकर एक – दूसरे से गले मिलते है और दोस्त बन जाते हैं। कुछ लोग भाँग और शराब का नशा भी करते हैं जो कि स्वस्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है। सभी लोग रँग, गुलाल और नाच-गानो के साथ पुरे दिन खूब मौज-मस्ती करते हैं।

होली मानाने के पीछे वैसे तो अनेकों पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, होलिका, हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कहानी उनमे से एक है:
बहुत समय पहले की बात है, हिरण्यकश्यप नामक एक अत्याचारी राक्षस था जिसने तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया था और अपने लिए कहीं भी और किसी के द्वारा न मरने का वरदान प्राप्त कर लिया था। उसको वरदान था कि वह,

“न दिन में मरेगा और न ही रात में।
न अश्त्र से मरेगा न शस्त्र से।
न धरती में, न आकाश में और न पाताल में।
न मनुष्य से मरेगा न जानवर से और न ही पशु – पक्षी से।”

हिरण्यकश्यप के एक पुत्र प्रह्लाद था और उसे भी वह अपनी तरह राक्षस बनाना चाहता था जबकि प्रह्लाद भगवान विष्णु की उपासना करता था। हिरण्यकश्यप नहीं चाहता था कि उसके शाशन कोई भी किसी देवी-देवता की पूजा करे। वह चाहता था कि सब लोग सिर्फ उसी की पूजा करें। उसने बहुत कोशिश किया कि प्रह्लाद भगवन की पूजा छोड़ दे लेकिन वह नाकामयाब रहा। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया जिसे यह वरदान था की वह कभी भी आग में नहीं जलेगी।

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को होलिका के साथ जलती आग में बैठा दिया, लेकिन परिणाम यह हुआ की होलिका आग में जल गई जबकि प्रह्लाद नारायण की कृपा से सुरक्षित बच गया। इससे हिरण्यकश्यप और नाराज हो गया और प्रह्लाद को मारने के लिये बहुत कोशिशें की। लेकिन कहते है की एक न एक दिन पाप का घड़ा भर ही जाता है।

भगवन विष्णु स्वयं नरसिंह (आधा शरीर नर का और आधा सिंह का) अवतार ले कर आये। शाम के समय हिरण्यकश्यप को अपनी गोद में लेकर अपने पंजों से उसका पेट फाड़ दिया और उसका वध कर दिया। इस तरह से बुराई पे अच्छाई की जीत हुई।

कहते हैं तभी से बुराई पे अच्छाई की जीत के लिए हर साल होली जलाई जाती है और लोग एक दूसरे के साथ प्रेम और सौहार्द के साथ होली का त्यौहार मनाया जाता है। लोगों का मानना है कि सारे ईर्ष्या और द्वेष इसी होलिका के साथ जल जाते हैं।

mayank-kumar
-मयंक कुमार
कानपुर (उ. प्र.)

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