हम बदलेंगे जग बदलेगा

दोस्तों इस कहानी के साथ एक ऐसा सन्देश जुड़ा है जो आपके मर्म को छू लेगा। समाज में फैले भ्रस्टाचार को साफ दर्शाती है और किस तरह से आम आदमी इस भ्रस्टाचार व लूट का शिकार होता है। हमारे देश का किशान जो सबसे ज्यादा मेहनत करता है, वो ही सबसे गरीब है क्यों? इन सब सवालों के जवाब इस कहानी में आपको मिल जायेंगे।

कुछ दिनों पहले की बात है, एक गाँव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था। उसी से उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी चलती थी। पूरे दिन वह पशुओं की देखभाल में लगा रहता था और बहुत मेहनत करता था।

एक दिन की बात है, उसकी बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया वो उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ रवाना हुवा। वो मक्खन गोल पेढ़ो की शकल मे बना हुआ था और हर पेढ़े का वज़न एक किलोग्राम था। शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया, और दुकानदार से चायपत्ती, चीनी, तेल और साबुन व अन्य घरेलू जरुरत की वस्तुएँ खरीदकर वापस अपने गाँव को रवाना हो गया।

हम बदलेंगे जग बदलेगाकिसान के जाने के बाद ……दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज़र मे रखना शुरू किया तभी उसे खयाल आया कि क्यूँ ना एक पेढ़े का वज़न किया जाए, वज़न करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 ग्राम का निकला, हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 ग्राम के ही निकले।

अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा, दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा कि वो अभी तुरंत दफा हो जाए, किसी बे-ईमान और धोखेबाज़ शख्स से कारोबार करना उसे गवारा नही। 900 ग्राम मक्खन को पूरा एक किलोग्राम कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नही करता।

किसान को दुकानदार की बात कुछ समझ में नहीं आ रही थी कि उससे ऐसी क्या गलती हो गई की दुकानदार उस पर आते ही बरस पड़ा! किसान ने हिम्मत जुटाई और बड़ी ही विनम्रता से दुकानदार से कहा–

मेरे भाई मुझसे नाराज ना हो हम तो गरीब और बेचारे लोग हैं, हमारी माल तोलने के लिए बाट (वज़न) खरीदने की हैसियत कहाँ? आपसे जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूँ उसी को तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर दूसरे पलड़े मे उतने ही वज़न का मक्खन तोलकर ले आता हूँ।

इस कहानी को पढ़ने के बाद आप क्या महसूस करते हैं, किसी पर उंगली उठाने से पहले क्या हमें अपने गिरहबान मे झांक कर देखने की ज़रूरत नही? कहीं ये खराबी हमारे अंदर ही तो मौजूद नही? क्योंकि अपने अंदर झांकना बहुत ही मुश्किल काम है।

यदि सचमुच में देश का भ्रस्टाचार मुक्त करना चाहते हैं तो हमें अपने आप को भ्रस्टाचार मुक्त बनाना पड़ेगा। हर इंसान अपने आप को सुधार लेगा तो देश अपने आप सुधर जायेगा। हम दूसरों से तो अपने लिए बहुत ही अच्छा व्यवहार चाहते हैं लेकिन दूसरों के प्रति हमारा रवैया अच्छा नहीं होता। इस सोच को बदलना पड़ेगा। “हम बदलेंगे तभी जग बदलेगा॥”

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