एक चुटकी ज़हर

Ek Chutki Jahar Story in Hindiदोस्तों जहाँ भी दो या दो से अधिक प्राणी या व्यक्ति रहते है, उनमे कभी न कभी आपस में कहा-सुनी हो ही जाती है। आमतौर पर परिवार के ज्यादातर झगड़े एक-दो या तीन दिनों में आपस में सुलझ जाते हैं। लेकिन अगर वो झगड़ा सास और बहू का हो तो उसे सुलझाना मुश्किल ही नहीं, असंभव है। इन दोनों के झगड़ों में इंसान (घर के मुखिया) बीच में पिसता रहता है। ऐसी ही सास-बहू के झगड़े को लेकर दिल को छू जाने वाली एक घटना आपके सामने रख रहा हूँ, उम्मीद है आपको जरूर पसन्द आएगी और हर इंसान को इससे कुछ न कुछ प्रेरड़ा जरूर मिलेगी।

विवाह के बाद एक युवती ससुराल में अपने पति और सास के साथ रहने लगी। कुछ ही दिनों बाद स्त्री को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। सास पुराने ख़यालों की थी और बहू नए विचारों वाली। स्त्री और उसकी सास का आये दिन झगडा होने लगा। दिन बीते, महीने बीते, यहाँ तक कि पूरा साल भी बीत गया। न तो सास टीका-टिप्पणी करना छोड़ती और न बहू जवाब देना। हालात बद से बदतर होने लगे।बहू को अब अपनी सास से पूरी तरह नफरत हो चुकी थी।बहू के लिए उस समय स्थिति और बुरी हो जाती जब उसे भारतीय परम्पराओं के अनुसार दूसरों के सामने अपनी सास को सम्मान देना पड़ता। अब वह किसी भी तरह सास से छुटकारा पाने की सोचने लगी। एक दिन जब बहू का अपनी सास से झगडा हुआ और पति भी अपनी माँ का पक्ष लेने लगा तो वह नाराज़ होकर मायके चली आई।

स्त्री के पिता आयुर्वेद के डॉक्टर थे। उसने रो-रो कर अपनी व्यथा पिता को सुनाई और बोली – आप मुझे कोई जहरीली दवा दे दीजिये जो मैं जाकर उस बुढ़िया को पिला दूँ नहीं तो मैं अब ससुराल नहीं जाऊँगी… बेटी का दुःख समझते हुए पिता ने आरती के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा – बेटी, अगर तुम अपनी सास को ज़हर खिला कर मार दोगी तो तुम्हें पुलिस पकड़ ले जाएगी और साथ ही मुझे भी क्योंकि वो ज़हर मैं तुम्हें दूंगा। इसलिए ऐसा करना ठीक नहीं होगा।

लेकिन बेटी जिद पर अड़ गई – आपको मुझे ज़हर देना ही होगा…
अब मैं किसी भी कीमत पर उसका मुँह देखना नहीं चाहती !
कुछ सोचकर पिता बोले – ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी। लेकिन मैं तुम्हें जेल जाते हुए भी नहीं देख सकता इसलिए जैसे मैं कहूँ वैसे तुम्हें करना होगा ! मंजूर हो तो बोलो ?
क्या करना होगा ?, बेटी ने पूछा।

पिता ने एक पुडिया में ज़हर का पाउडर बाँधकर बेटी के हाथ में देते हुए कहा – तुम्हें इस पुडिया में से सिर्फ एक चुटकी ज़हर रोज़ अपनी सास के भोजन में मिलाना है।

कम मात्रा होने से वह एकदम से नहीं मरेगी बल्कि धीरे-धीरे आंतरिक रूप से कमजोर होकर 5 से 6 महीनों में मर जाएगी। लोग समझेंगे कि वह स्वाभाविक मौत मर गई।

पिता ने आगे कहा – लेकिन तुम्हें बेहद सावधान रहना होगा ताकि तुम्हारे पति को बिलकुल भी शक न होने पाए वरना हम दोनों को जेल जाना पड़ेगा ! इसके लिए तुम आज के बाद अपनी सास से बिलकुल भी झगडा नहीं करोगी बल्कि उसकी सेवा करोगी।

यदि वह तुम पर कोई टीका टिप्पणी करती है तो तुम चुपचाप सुन लोगी, बिलकुल भी प्रत्युत्तर नहीं दोगी ! बोलो कर पाओगी ये सब ?

बेटी ने सोचा, छ: महीनों की ही तो बात है, फिर तो छुटकारा मिल ही जाएगा। उसने पिता की बात मान ली और ज़हर की पुडिया लेकर ससुराल चली आई।

ससुराल आते ही अगले ही दिन से आरती ने सास के भोजन में एक चुटकी ज़हर रोजाना मिलाना शुरू कर दिया। साथ ही उसके प्रति अपना बर्ताव भी बदल लिया। अब वह सास के किसी भी ताने का जवाब नहीं देती बल्कि क्रोध को पीकर मुस्कुराते हुए सुन लेती। रोज़ उसके पैर दबाती और उसकी हर बात का ख़याल रखती। सास से पूछ-पूछ कर उसकी पसंद का खाना बनाती, उसकी हर आज्ञा का पालन करती।

कुछ हफ्ते बीतते-बीतते सास के स्वभाव में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया। बहू की ओर से अपने तानों का प्रत्युत्तर न पाकर उसके ताने अब कम हो चले थे बल्कि वह कभी-कभी बहू की सेवा के बदले आशीष भी देने लगी थी।

धीरे-धीरे चार महीने बीत गए। स्त्री नियमित रूप से सास को रोज़ एक चुटकी ज़हर देती आ रही थी। किन्तु उस घर का माहौल अब एकदम से बदल चुका था। सास बहू का झगडा पुरानी बात हो चुकी थी। पहले जो सास आरती को गालियाँ देते नहीं थकती थी, अब वही आस-पड़ोस वालों के आगे आरती की तारीफों के पुल बाँधने लगी थी।

बहू को साथ बिठाकर खाना खिलाती और सोने से पहले भी जब तक बहू से चार प्यार भरी बातें न कर ले, उसे नींद नही आती थी। छठा महीना आते-आते बहू को लगने लगा कि उसकी सास उसे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानने लगी हैं। उसे भी अपनी सास में माँ की छवि नज़र आने लगी थी।

जब वह सोचती कि उसके दिए ज़हर से उसकी सास कुछ ही दिनों में मर जाएगी तो वह परेशान हो जाती थी।
इसी ऊहापोह में एक दिन वह अपने पिता के घर दोबारा जा पहुंची और बोली – पिताजी, मुझे उस ज़हर के असर को ख़त्म करने की दवा दीजिये क्योंकि अब मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती …!
वो बहुत अच्छी हैं और अब मैं उन्हें अपनी माँ की तरह चाहने लगी हूँ!
पिता ठठाकर हँस पड़े और बोले – ज़हर ? कैसा ज़हर ? मैंने तो तुम्हें ज़हर के नाम पर हाजमे का चूर्ण दिया था … हा हा हा !!!

दोस्तों हर माँ-बाप को अपनी बेटी को सही रास्ता दिखाना चाहिये न कि उसकी हाँ में हाँ मिलाकर उसके घर को बर्बाद करने में उसकी सहायता करनी चाहिये। मेरी हर माँ-बाप से यही विनती है कि अपनी बेटियों को सही शिक्षा देकर माँ-बाप का पूर्ण फर्ज अदा करें। अगर हर माँ-बाप अपनी बेटियों को सही शिक्षा दें तो हमारे देश में संयुक्त परिवार की परंपरा फिर से वापस आ सकती है।

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