अपने पास बुला ले माँ

माँ अब तेरे हाथ नहीं जलेंगे

शाम को घर वापस आकर, जब कपड़े फेंके बिस्तर पर।
सोचा था माँ आकर, रख देगी इसको तहकर कर।।

कुछ पल के बाद उस कपड़े ने, मुझको आवाज लगाई।
बोला कुछ पैसों की खातिर, कहाँ आ गए भाई।।

पानी भी खुद लाकर पीयो, रखो मुझे जगह पर।
सब कुछ रखो ठीक अपना, माँ यहाँ नहीं है भाई।।

अब वो दिन न आयेंगे, लौट के फिर से जीवन में।
जब रहते थे हम हर पल, माँ तेरे आँगन में।।

जब भी लगे जरा सी ठोकर, याद तेरी माँ आये।
पहले जैसे ही मेरी माँ, तू दौड़ उसे सहलाये।।

त्याग, तपस्या, तिरस्कार, सब सहकर हमको पाला।
तेरे प्यार ने ही मेरी माँ, हर गम में हमें संभाला।।

मेरे खातिर स्वप्न सजाती, पल-पल जगती आँखों से माँ।
‘विकल’ न होने दिया पुत्र को, कभी न हिम्मत हारी तू माँ।।

जब घर छोड़ के मैं निकलूँ, तू मुझसे नजर चुराये।
फिर भी आँचल का कोना, तेरी आँखों को छू जाये।।

तू ही एक ऐसी है माँ, जिसको फिकर है मेरी।
इतना बड़ा हुआ क्यूँ मैं, कि तुझसे हो गई दूरी।।

या तो कैसे तुझ बिन जियूँ, ये मुझको सिखला दे माँ।
या कैसे भी कुछ भी करके, अपने पास बुला ले माँ।।

—> By: कुलदीप सिंह

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